рд╕ोрдорд╡ाрд░, 28 рдЕрдХ्рдЯूрдмрд░ 2019

Anokhi kahaniya 12

*"तीन सवाल"*

*एक बार एक राजा था। एक दिन वह बड़ा प्रसन्न मुद्रा में था सो अपने वज़ीर के पास गया और कहा कि तुम्हारी जिंदगी की सबसे बड़ी ख़्वाहिश क्या हैं? वज़ीर शरमा गया और नज़रे नीचे करके बैठ गया। राजा ने कहा तुम घबराओ मत तुम अपनी सबसे बड़ी ख़्वाहिश बताओ। वज़ीर ने राजा से कहा हुज़ूर आप इतनी बड़ी सल्लतनत के मालिक हैं और जब भी मैं यह देखता हूँ तो मेरे दिल में ये चाह जाग्रत होती हैं कि काश मेरे पास इस सल्लतनत का यदि दसवां हिस्सा होता तो मैं इस दुनिया का बड़ा खुशनसीब इंसान होता। ये कह कर वज़ीर खामोश हो गया। राजा ने कहा कि यदि मैं तुम्हें अपनी आधी जायदाद दे दूँ तो। वज़ीर घबरा गया और नज़रे ऊपर करके राजा से कहा कि हुज़ूर ये कैसे मुनकिन हैं? मैं इतना खुशनसीब इंसान कैसे हो सकता हूँ। राजा ने दरबार में आधी सल्लतनत के कागज तैयार करने का फरमान जारी करवाया और साथ के साथ वज़ीर की गर्दन धड़ से अलग करने का ऐलान भी करवाया। ये सुनकर वज़ीर बहुत घबरा गया। राजा ने वज़ीर की आँखों में आँखे डालकर कहा तुम्हारे पास तीस दिन हैं, इन तीस दिनों में तुम्हें मेरे तीन सवालों के जवाब पेश करना हैं। यदि तुम कामयाब हो जाओगे तो मेरी आधी सल्लतनत तुम्हारी हो जायेगी और यदि तुम मेरे तीन सवालों के जवाब तीस दिन के भीतर न दे पाये तो मेरे सिपाही तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर देंगे। वज़ीर ओर ज्यादा परेशान हो गया। राजा ने कहा मेरे तीन सवाल लिख लो, वज़ीर ने लिखना शुरु किया। राजा ने कहा....*

*1) इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई क्या हैं?*
*2) इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा धोखा क्या हैं?*
*3) इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी कमजोरी क्या हैं?*

*राजा ने तीनों सवाल समाप्त करके कहा तुम्हारा समय अब शुरु होता हैं। वज़ीर अपने तीन सवालों वाला कागज लेकर दरबार से रवाना हुआ और हर संतो-महात्माओं, साधु-फक़ीरों के पास जाकर उन सवालों के जवाब पूछने लगा। मगर किसी के भी जवाबों से वह संतुष्ट न हुआ। धीरे-धीरे दिन गुजरते हुए जा रहे थे। अब उसके दिन-रात उन तीन सवालों को लिए हुए ही गुजर रहे थे। हर एक-एक गाँवों में जाने से उसके पहने लिबास फट चुके थे और जूते के तलवे भी फटने के कारण उसके पैर में छाले पड़ गये थे। अंत में शर्त का एक दिन शेष रहा, फक़ीर हार चुका था तथा वह जानता था कि कल दरबार में उसका सिर धड़ से कलाम कर दिया जायेगा और ये सोचता-सोचता वह एक छोटे से गांव में जा पहुँचा। वहाँ एक छोटी सी कुटिया में एक फक़ीर अपनी मौज में बैठा हुआ था और उसका एक कुत्ता दूध के प्याले में रखा दूध बड़े ही चाव से जीभ से जोर-जोर से आवाज़ करके पी रहा था।*

*वज़ीर ने झोपड़ी के अंदर झाँका तो देखा कि फक़ीर अपनी मौज में बैठकर सुखी रोटी पानी में भिगोकर खा रहा था। जब फक़ीर की नजर वज़ीर की फटी हालत पर पड़ी तो वज़ीर से कहा कि जनाबेआली आप सही जगह पहुँच गये हैं और मैं आपके तीनों सवालों के जवाब भी दे सकता हूँ। वज़ीर हैरान होकर पूछने लगा आपने कैसे अंदाजा लगाया कि मैं कौन हूँ और मेरे तीन सवाल हैं? फक़ीर ने सूखी रोटी कटोरे में रखी और अपना बिस्तरा उठा कर खड़ा हुआ और वज़ीर से कहा साहिब अब आप समझ जायेंगे। फक़ीर ने झुक कर देखा कि उसका लिबास हू ब हू वैसा ही था जैसा राजा उस वज़ीर को भेंट दिया करता था। फक़ीर ने वज़ीर से कहा मैं भी उस दरबार का वज़ीर हुआ करता था और राजा से शर्त लगा कर गलती कर बैठा। अब इसका नतीजा तुम्हारे सामने हैं। फक़ीर फिर से बैठा और सूखी रोटी पानी में डूबो कर खाने लगा। वज़ीर निराश मन से फक़ीर से पूछने लगा क्या आप भी राजा के सवालों के जवाब नहीं दे पाये थे। फक़ीर ने कहा कि नहीं मेरा केस तुम से अलग था। मैने राजा के सवालों के जवाब भी दिये और आधी सल्लतनत के कागज को वहीं फाड़कर इस कुटिया में मेरे कुत्ते के साथ रहने लगा। वज़ीर ओर ज्यादा हैरान हो गया और पूछा क्या तुम मेरे सवाल के जवाब दे सकते हो? फक़ीर ने हाँ में सिर हिलाया और कहा मैं आपके दो सवाल के जवाब मुफ्त में दूँगा मगर तीसरे सवाल के जवाब में आपको उसकी कीमत अदा करनी पड़ेगी।*

*अब फक़ीर ने सोचा यदि बादशाह के सवालों के जवाब न दिये तो राजा मेरे सिर को धड़ से अलग करा देगा इसलिए उसने बिना कुछ सोचे समझे फक़ीर की शर्त मान ली। फक़ीर ने कहा तुम्हारे पहले सवाल का जवाब हैं "मौत"। इंसान के जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई मौत हैं। मौत अटल हैं और ये अमीर-गरीब, राजा-फक़ीर किसी को नहीं देखती हैं। मौत निश्चित हैं। अब तुम्हारे दूसरे सवाल का जवाब हैं "जिंदगी"। इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा धोखा हैं जिंदगी। इंसान जिंदगी में झूठ-फरेब और बुरे कर्मं करके इसके धोखे में आ जाता हैं।*

*अब आगे फक़ीर चुप हो गया। वज़ीर ने फक़ीर के वायदे के मुताबिक शर्त पूछी, तो फक़ीर ने वज़ीर से कहा कि तुम्हें मेरे कुत्ते के प्याले का झूठा दूध पीना होगा। वज़ीर असमंजस में पड़ गया और कुत्ते के प्याले का झूठा दूध पीने से इंकार कर दिया। मगर फिर राजा द्वारा रखी शर्त के अनुसार सिर धड़ से अलग करने का सोचकर बिना कुछ सोचे समझे कुत्ते के प्याले का झूठा दूध बिना रुके एक ही सांस में पी गया। फक़ीर ने जवाब दिया कि यही तुम्हारे तीसरे सवाल का जवाब हैं "गरज"। इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी कमजोरी हैं "गरज"। गरज इंसान को न चाहते हुए भी वह काम कराती हैं जो इंसान कभी नहीं करना चाहता हैं। जैसे तुम! तुम भी अपनी मौत से बचने के लिए और तीसरे सवाल का जवाब जानने के लिए एक कुत्ते के प्याले का झूठा दूध पी गये। गरज इंसान से सब कुछ करा देती हैं। मगर अब वज़ीर बहुत प्रसन्न था क्योंकि उसके तीनों सवालों के  जवाब उसे मिल गये थे। वज़ीर ने फक़ीर को शुक्रियाअदा किया और महल की ओर रवाना हो गया। जैसे ही वज़ीर महल के दरवाजे पर पहुँचा उसे एक हिचकी आई और उसने वहीं अपना शरीर त्याग दिया। उसको मौत ने अपने आगोश में ले लिया।*

*अब हम भी विचार करें कि क्या कहीं हम भी तो जिंदगी की सच्चाई को भूले तो नहीं बैठे हैं? जी हाँ जिंदगी की सच्चाई ये मौत। ये मौत न छोटा देखती हैं न बड़ा, न सेठ साहूकार देखती हैं। ये तो न जाने कब किस को अपने आगोश में ले ले कुछ कहा नहीं जा सकता। क्योंकि ये अटल सत्य हैं और ये हर एक को आनी हैं। क्या हम जिंदगी के धोखे में तो नहीं आ पड़े हैं? हाँ जी बिल्कुल! हम धोखे में ही आये हुए हैं। हम जिंदगी को ऐसे जीते हैं जैसे ये जिंदगी कभी खत्म न होगी। हम जिंदगी में हर रोज नये-नये कर्मों का निर्माण करते हैं। इन कर्मों में कुछ अच्छे होते हैं तो कुछ बुरे। हम जिंदगी के धोखे में ऐसे फंसे हुए हैं कभी भूल से भी मालिक का शुकर नहीं करते हैं, कभी सच्चे दिल से मालिक का भजन सिमरन नहीं करते हैं। बस जिंदगी को काटे जा रहे हैं। क्या हम भी तो जिंदगी की कमजोरी के शिकार तो नहीं बने बैठे हैं? जी हाँ, हम सभी गरज के तले दबे हुए हैं। कोई अपने परिवार को पालने की गरज में झूठ-फरेब की राह पर चलने लगता हैं तो कोई चोरी और लूटपाट। हम सभी गरज की दलदल में फंसे हुए हैं।*

*हमें भी चाहिए कि जिंदगी की सच्चाई मौत को ध्यान में रखते हुए, जिंदगी की झूठ में न फंसे। क्योंकि जितना हम जिंदगी की सच्चाई से मुख मोड़ेगें उतना ही हम धोखे का शिकार होते जायेंगे। अत: जिससे हम जीवन भर जिंदगी की कमजोरी गरज के दलदल में ही फंसे रहे और बाहर ही न निकल सकें। इसलिए समय रहते हुए मालिक का भजन सिमरन करते रहे और मालिक को याद करते हुए उनका शुक्रियाअदा करते रहें। क्योंकि न जाने कब मालिक का फरमान आ जाए। इसलिए सतगुरु द्वारा बक्क्षी दात का लाभ उठाये जी और मालिक में ही समा जाए जी।

Anokhi kahaniya 11


गालिब को एक दफा, बहादुरशाह ने बुलाया है। निमंत्रण दिया है, भोजन के लिए आ जाओ। कवि है, गरीब आदमी है। फटे-पुराने पहनकर चलने लगा। मित्रों ने कहा, यह पहनकर मत जाओ। राजा के दरवाजे पर ये कपड़े नहीं पहचाने जाते। गालिब ने कहा, मुझे बुलाया है कि मेरे कपड़ों को? नासमझ रहा होगा। दुनिया में कपड़े ही बुलाए जाते हैं, पहचाने जाते हैं। आदमी--आदमी को बुलाने को वक्त कहां, आया अभी तक? समय कहां आया वह? गालिब नहीं माना। कुछ लोग जिद्दी होते हैं, नहीं मानते। मित्रों ने बहुत कहा, हम उधार कपड़े ले आते हैं। गालिब ने कहा, उधार कपड़े--क्या उचित होगा? उससे तो फटे-पुराने अपने ही बेहतर--कम से कम अपने तो है। कोई यह तो नहीं कह सकता कि उधार हैं। उन्होंने कहा, पागल हुए हो, कौन पहचानता है कि उधार है कि अपना है। इस दुनिया में सब उधार चल रहा है। उधार ज्ञान से आदमी ज्ञानी हो जाता है। तुम उधार कपड़ों की फिकर करते हो? गालिब नहीं माना। गालिब ने कहा, नहीं, जो अपना है वही ठीक है। गरीब भी, भी अपना ही तो है। फिर कपड़े की क्या फिकर! मैं हूं। मैं तो वही रहूंगा। कपड़े कोई भी हों। मित्रों ने कहा, यह सब तुम नासमझी की बातें कर रहे हो। आदमी कपड़े से बदल जाते हैं। कपड़े जैसे हैं वैसा आदमी हो जाता है। नहीं माना गालिब, चला गया। दरवाजे पर जाकर जब भीतर जाने लगा द्वार पर खड़े द्वारपाल ने एक धक्का दिया और कहा, कहां भीतर जा रहे हो? यह कोई धर्मशाला है? कहां घुस रहे हो? गालिब ने कहा, मुझे बुलाया गया है। सम्राट मेरे मित्र हैं। उन्होंने निमंत्रण भेजा है। उस सिपाही ने कहा, हद हो गयी। हर किसी भिखमंगे को सम्राट से दोस्ती का खाल हो जाता है। रास्ते पर चलो,अन्यथा उठाकर बंद करवा दूंगा। गालिब को तब मित्र याद आए कि गलती हो गयी। शायद कपड़े ही पहचाने जाते हैं। गालिब वापस लौट आया। मित्रों से कहा, क्षमा मांगता हूं, भूल हो गई। कपड़े ले आओ। मित्र तो उधार कपड़े ले आए।

जूते उधार हैं, पगड़ी उधार है, कोट उधार है, सब उधार है। उधार आदमी बड़ा जंचता है। गालिब खूब जंचने लगे। सड़क पर हर दुकानदार झुक-झुककर नमस्कार करने लगा। आदमी की यह जात, या आदमियत अब तक उधार ही को नमस्कार करती रही है। यही गालिब थोड़ी देर पहले इसी रास्ते से निकला था। किसी ने नमस्कार नहीं किया था। रास्ता वही है,लोग वही है, गालिब वही है, कपड़े बदल गए, सब बदल गया। गालिब तो हैरान हो गया। यह सत्य कभी न जाना था कि कपड़ों में इतना सत्य है। द्वारपाल के पास पहुंचा है। द्वारपाल ने झुककर नमस्कार किया, और कहा कि कहां पहुंचाऊं? कैसे आए महाराज? गालिब ने गौर से उसे देखा लेकिन द्वारपाल नहीं पहचानता। आंख है, आंखों में कौन झांकता है?
कपड़ों में देखने से फुर्सत मिले कि कोई आंखों में झांके। आदमी कौन देखता है? कपड़ों से आंख हटे तो कोई आदमी को देखे और जिनके भीतर आदमी कभी नहीं होता वे चौबीस घंटे कपड़ों की फिकर में होते हैं। कोई गेरुवा कपड़े रंगे हुए खड़ा है। आदमी भीतर बिलकुल नहीं है। कोई और तरह के कपड़े रंगे हुए खड़ा है। आदमी भीतर बिलकुल नहीं है। कोई गहने पहने खड़ा है। कोई स्त्री सजी-धजी खड़ी है। आदमी भीतर बिलकुल नहीं है। जब तक यह साज-बाज बहुत जोर से चलेगा ऊपर, तो जानना कि भीतर कोई कमी है, जिसे ऊपर से दिखाया जा रहा है। लेकिन यही दुनिया है, यही पहचाना जाता है। गालिब भीतर पहुंचा दिए गए। सम्राट ने कहा, बड़ी देर से राह देखता हूं। गालिब करे भोजन पर बिठाया। उठाकर भोजन गालिब अपनी पगड़ी को कहने लगा, कि ले पगड़ी खा--ले कोट खा। सम्राट ने कहा, क्या करते हैं आप? आपके खाने की बड़ी अजीब आदत मालूम होती है। गालिब ने कहा, अजीब आदत नहीं महाराज। मैं तो पहले आया था, अब नहीं आया हूं। अब नहीं आया हूं। अब कपड़े ही आए हैं। मैं तो आकर जा भी चुका। और अब कभी न आऊंगा। क्योंकि जहां पकड़े पहचाने जाते हैं वहां अपनी क्या जरूरत है? अब तो कपड़े ही आए हैं। अब तो कपड़ों को भोजन करा दूं और वापस लौट जाऊं।

यह हम जिस जिंदगी की दौड़ के दौड़ समझ रहे हैं, खोज को खोज समझ रहे हैं, यात्रा समझ रहे हैं। यह कपड़ों से ज्यादा हैं क्या? हम क्या खोज रहे हैं? इस सबको खोजकर भी क्या हम उसे पा लेंगे जो हम हैं? और फिर आप पूछते हैं, क्यों खोजें ईश्वर को? ईश्वर की खोज का मतलब क्या है? ईश्वर की खोज का मतलब है, उसकी खोज, जो है। और संसार की खोज का मतलब है, उसकी खोज--जो नहीं है। संसार की खोज का मतलब है--असत्य की खोज। प्रभु के मंदिर की खोज का अर्थ है सत्य की खोज। और असत्य का केंद्र है अहंकार। संसार का केंद्र है अहंकार। और प्रभु को जो खोजने जाता है। वह अपने को खोता है। धीरे-धीरे खोता है,

मैंने कल कहा, विश्वास खोदो। आज कहा, विचार भी खो दो। कल कुछ और खोने को कहूंगा। परसों कुछ और। एक घड़ी ऐसी आती है कि जो भी नानएसेंशियल है, जो भी ऊपर से जड़ा है, जो भी वस्त्र है, वे सब खो दो। रह जाने दो उसे, जो नहीं खोया जा सकता। और जिस दिन सिर्फ वही बच जाता है जिसे खोना असंभव है उसी दिन क्रांति घटित हो जाती है। प्रभु मंदिर का द्वार खुल जाता है।

मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना उसके लिए मैं बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। और अंत में सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं।