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Anokhi kahaniya -6

एक कहानी मैंने सुनी है। एक सम्राट् का वजीर मर गया। बड़ा बुद्धिमान। दूर-दूर तक उसकी ख्याति थी। उसके स्थान को भरना भी मुश्किल था। खोज शुरू हुई सारे साम्राज्य में।

जगह-जगह से बुद्धिमानों को बुलाया गया, खोजबीन की गई। फिर तीन बुद्धिमान चुने गए अंततः और उनकी अंतिम परीक्षा बड़ी अनूठी थी।

उन्हें एक कमरे में ले जाकर छोड़ दिया गया। सम्राट् ने कहा कि तुम अंदर बैठो, मैं दरवाजे पर ताला लगा जाता हूं; जो सबसे पहले इस ताले को खोलकर बाहर आ जाए, वजीर हो जाएगा। चाबी तुम्हें देता नहीं हूं। इस ताले की कोई चाबी नहीं है। यह ताला गणित की एक पहेली है।

ताला क्या था, उस पर अंक ही अंक लिखे थे। अगर तुम यह पहेली हल कर लोगे तो इन अंकों को जमाने की कला तुम्हें आ जाएगी। अंकों के जमते ही ताला खुल जाएगा और तुम बाहर आ जाओगे।

जल्दी ही वे काम में लग गए। पहले ने जल्दी से अपनी किताबें निकाल लीं जिन्हें वह चोरी से अपने वस्त्रों में छिपा लाया था । अफवाहें उड़ गई थीं कि इस तरह का एक ताला बनाया गया है, जिसकी कोई चाबी नहीं है; जिस पर गणित के अंक हैं; अंकों के जमा लेने से ताला खुलेगा। तो वह गणित की बड़ी किताबें ले आया था।

उसने किताबें खोलकर जल्दी खोज-बीन शुरू कर दी कि कहीं कोई उपाय मिल जाए। लेकिन किताबों में जो उलझा हो, उसे उपाय नहीं मिलते। वह किताब में उलझ गया, ताले पर तो ध्यान ही न दे पाया।

समस्याएं किताबों में से नहीं सुलझतीं। समस्याएं तो समस्याओं को गौर से देखने से सुलझती हैं। समस्याएं तो समस्याओं में गहरे उतरने से सुलझती हैं। समस्याओं का समाधान तो समस्याओं की ही गहराई में पड़ा होता है, उनकी ही तलहटी में पड़ा होता है।

हर प्रश्न अपने उत्तर को अपने भीतर छिपाए है। तुम ज़रा प्रश्न की सीढ़ियों से उतरो और तुम उत्तर के तल तक पहुंच जाओगे।

मगर उसे फुर्सत न थी। बड़ी किताबें ले आया था। पन्ने पलट रहा था। जल्दबाजी थी। किताब भी ठीक से पढ़ नहीं पाता था, कहीं दूसरा खोल न ले!

दूसरे ने जल्दी से अपने कागज निकाल लिए; वह कलम-कागज लेकर आया था। बड़ी गहरी गणित की गुत्थियों को सुलझाने में लग गया। सारे ताले के अंक उसने लिख लिए और जल्दी कागज पर सुलझाने में लग गया। सारे ताले के अंक उसने लिख लिए और जल्दी कागज पर सुलझाने में व्यस्त हो गया।

और तीसरे आदमी ने पता है, क्या किया वह एक कोने में आंख बंद करके बैठ गया। न वह किताबें लाया था; उसके पास कोई शास्त्र नहीं थे--न गीता, न कुरान न, बाईबिल। वह कोई कागज-कलम भी न लाया था। उसने तो आंखें बंद कर लीं और शांत होकर बैठ गया। उन दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और हंसे। उन्होंने कहा, यह मूढ़ देखो! आंख बंद करके वहां क्या कर रहा है? आंख बंद करने से कहीं ताले खुले हैं।

मगर कुछ ताले हैं जो आंख बंद करने से खुलते हैं।
"यह वहां आंख बंद करके क्या खोल रहा है? लगता है हताश हो गया।'

ध्यान में बैठे आदमी को देखकर लोग अकसर सोचते हैं--हताश हो गया। जिंदगी से हार गया। हारे को हरिनाम! अब जैसे जप रहे हैं राम-राम, गए काम से! डगमगा गए पैर।
"यह क्या कर रहा है पागल?'

लेकिन वह आदमी बैठा ही रहा। वह ऐसे हो गया जैसे बुद्ध की मूर्ति। वह इतना शांत हो गया . . .। उसने सारे विचार विदा कर दिए। ताले का भी विचार भी विदा कर दिया। ताला खोलना है, यह विचार भी विदा कर दिया। निर्विचार हो गया।

और निर्विचार में एक तरंग उठी। वह तरंग विचार की नहीं थी, भाव की थी। वह तरंग मस्तिष्क में नहीं आई थी, हृदय से उठी थी। एक तरंग उठी। उसी तरंग में वह उठ आया। तरंग में लोग उठ गए हैं। तरंग में लोग ऐसे उठ गए हैं कि परमात्मा तक पहुंच गए हैं। तरंग में लोग उठ गए हैं, नाच गए हैं, गीत फूट गया है, फूल खिल गए हैं! वह तरंग में उठ गया। उसे पता भी नहीं, क्यों उठा?

मजा जानते हो उस उठने का, जब तुम्हें पता भी नहीं होता कि तुम क्यों उठे? जब एक गीत फूटता है तुम्हारे कंठ से और तुम्हें पता भी नहीं होता कि क्यों, कौन गा गया! और एक भावभंगिमा प्रकट होती है, जो तुम्हारी नहीं है! क्योंकि तुम्हारी आयोजित नहीं है। क्योंकि तुमने उसकी व्यवस्था नहीं की है। जो तुमसे उपर से आती है। जो परमात्मा की ही होगी।

इसलिए हमने राम को भगवान् कहा, बुद्ध को भगवान् कहा, कृष्ण को भगवान कहा, क्राइस्ट को भगवान् कहा। किस कारण कहा? ये भावभंगिमाएं इनकी नहीं थीं। देह तो इनकी ही थी, मगर देह में जो भाव उतरा था वह इनका नहीं था। आंखें तो इनकी थीं, लेकिन आंखों में जो गहराई आ गई थी वह उनकी नहीं थी। शब्द तो इनके ही थे, मगर शब्दों में जो अर्थ था वह उनका नहीं था। ये उठ खड़े हुए थे।

ऐसे ही वह आदमी उठ खड़ा हुआ। वह कहां जा रहा है, उसे पता नहीं। वह क्यों जा रहा है, उसे पता नहीं। कोई उसे ले चला। और जब कोई तुम्हें ले चलता है तब तुम पहुंचते हो। अपने से कोई नहीं पहुंचता; उसके ले जाने से पहुंचता है। वह चल पड़ा।

उसने बाहर जाकर दरवाजे को हाथ से छुआ। दरवाजा अटका था। ताला बंद था ही नहीं। दरवाजा खुल गया। वह चुपचाप बाहर निकल गया। वे जो किताब में उलझे थे और जो गणित का हल कर रहे थे, उन्हें पता भी न चला कि कोई बाहर भी हो गया।

इस जगत् में पता भी नहीं चलता उन लोगों का जो चुपचाप बाहर हो जाते हैं। कौन कब चुपचाप सरक जाता है समाधि के द्वार से परमात्मा में, लोगों को कानों-कान खबर भी नहीं होती। लोग अपने कामों में व्यस्त हैं--कोई अपनी दुकान पर खाते-बही में लगा है, कोई अपने दफ्तर में फाइलों में उलझा है, कोई किसी और काम में, कोई किसी और काम में, कोई धन में कोई पद में, कोई प्रतिष्ठा में। फुर्सत किसको है! कौन बाहर हो गया--कौन कबीर कौन सुंदरदास कौन नानक --कब चुपचाप, किसने उठा दिया . . . !

उन्हें तो पता तब चला जब सम्राट् भीतर आया उस तीसरे आदमी को लेकर  और कहा कि भाई बंद करो किताबें, बंद करो तुम्हारी लिखा-पढ़ी। जिसे बाहर निकलना था वह निकल चुका।

उनको तो भरोसा न आया आंखें उठाईं। वे तो चौंके के चौंके रह गए, अवाक्। उन्होंने कहा, यह हुआ कैसे? उस आदमी से पूछा कि तुम निकले कैसे? उसने कहा, मुझे कुछ पता नहीं। एक बात पक्की थी कि गणित मैंने कभी हल नहीं किए। सो मैंने कहा, यह अपने बस का नहीं। नाहक मेहनत करने से सार भी क्या है?

मैं अवश होकर बैठ गया, अपने बस का नहीं। मैंने परमात्मा को कहा कि तेरी मर्जी हो तो कुछ कर। सब मैंने उसकी मर्जी पर छोड़ दिया। फिर किसने मुझे उठाया, किसने मुझे द्वार तक पहुंचाया, किसने मुझे यह भाव दिया कि दरवाजा सिर्फ अटका है बंद नहीं है कि एक मजाक की गई है।

और समझो, ताले लगे हों तो चाबियां खोजी जा सकती हैं। उलझन हो, सुलझाई जा सकती है। समस्या हो, समाधान हो सकते हैं। कठिनाई तो यही है कि परमात्मा समस्या नहीं है, इसलिए तुम्हारे समाधानों से कुछ भी न होगा। उसके द्वार पर ताला नहीं पड़ा है।

इसलिए तुम बिठाते रहो कुंजियां, बनाते रहो कुंजियां, तुम्हारी कोई कुंजियां काम नहीं आएंगी। तुम्हारे कागजों पर फैलाए गए तुम्हारे गणित के विस्तार, तुम्हारे मन को और उलझा जाएंगे, और जंगलों में भटका जाएंगे।

परमात्मा कोई गणित का सवाल नहीं, न दर्शन की कोई समस्या है। परमात्मा उलझाव नहीं है। परमात्मा खुली किताब है।